भारतीय संस्कृति और 'स्वच्छता अभियान'


देश अभी 'स्वच्छता अभियान' के दौर से गुजर रहा है। लगभग सभी सरकारी और गैर सरकारी संगठन 'स्वच्छ भारत' बनाने के अभियान में जुटे हैं। शौचालय-निर्माण से लेकर स्वच्छता पर सेमिनार तक इस अभियान के हिस्सा हैं। डाउन टू अर्थ  पत्रिका, जो पिछले कई वर्षों से प्रकाशित हो रही है, स्वच्छता की समस्या से अटूट रिश्ता रखती है। आज पटना में उक्त पत्रिका की ओर से एक कार्यक्रम आयोजित था जिसमें थोड़े क्षणों के लिए मुझे भी शरीक होने का अवसर प्राप्त हुआ।

स्वच्छता अभियान में 'खुले में शौच' को विशेष 'फोकस' किया जा रहा है। माना जा रहा है खुले में शौच करना 'असभ्यता' और अस्वास्थ्यकर है। बताया जा रहा है कि हम जो खुले में शौच करते हैं वह हमारे वातावरण को तो दूषित करता ही है, साथ ही साथ और अंततः पेय जल में मिल जाता है। गोष्ठी में एक वक्ता ने कहा कि सूअर भी अपना मल नहीं खाता लेकिन खुले में शौच के परिणामस्वरूप हम मनुष्य पेय जल के रूप में मलपान करने को विवश हैं। मैं खुले में शौच करने की वकालत का साहस तो नहीं कर सकता लेकिन हमारा ग्रामीण जीवनानुभव इस तरह के तर्क को मानने से इनकार अवश्य ही करेगा। जिन्होंने गांव देखा है उनको मालूम है कि मल सूअर का पसंदीदा पारंपरिक आहार है। वे मल को अविलंब खा डालते हैं। अगर सूअर न भी हो तो ऐसे-ऐसे कीड़े होते हैं जो दो दिन में मल को मिट्टी बना डालते हैं। इसलिए पेयजल के रूप में मलपान करने की बात वही कर सकता है जिसने गांव सिर्फ किताबों में देखा, पढ़ा है।

हमारी भारतीय संस्कृति में मल इतना 'त्याज्य' और 'घृणित' कभी नहीं रहा है जितना इसे आज साबित करने की कोशिशें हो रही हैं। कहीं यह 'घृणा की राजनीति' का अनिवार्य फल तो नहीं? मैं बचपन से सुनता आ रहा हूँ कि 'सुखल गुह ब्राह्मण के लिट्टी', अर्थात सूखा हुआ मल तो ब्राह्मण की तरह दोषमुक्त है! भारतीय संस्कृति में अपना मल-मूत्र खाने की प्राचीन परंपरा रही है। पेशाब को शिवाम्बु भी कहा जाता रहा है और अघोरी जैसे पंथों के लोग तो आज भी मल-मूत्रपान को सिद्धि का अनिवार्य सोपान मानते हैं। और तो और मैंने अपने बचपन में मल को रामबाण औषधि की तरह व्यवहृत होते देखा है। एक समय की बात है जब मेरे पड़ोस की एक महिला ने आत्महत्या के निमित्त जहर खा लिया था। कई तरह के घरेलू उपचार किये गये लेकिन सब निष्फल गया। अंत में किसी की बुद्धि खुली और उसने मल घोलकर पिलाने की बात की। सलाह मान ली गई और मल पीते ही अगले क्षण मरीज ने सारा जहर बाहर उँड़ेल दिया। गनीमत कहिए कि उसकी अंतड़ियां अंदर ही रहीं।

बौद्ध ग्रंथ की एक कहानी में वर्णित है कि सक्क रोगी बुद्ध के शौचालय को स्वयं अकेले साफ करने पर जोर देता है और कहा गया है कि बुद्ध के मलमूत्र को अपने सिर पर उठाकर ले जाने में उसने बड़े आनंद का अनुभव किया। (देवराज चानना, प्राचीन भारत में दासता, पृष्ठ 196) बुद्ध के शौचालय का वर्णन प्रस्तुत है : 'उस शौचालय का दरवाजा था। वह सुगंधों से भरा हुआ था और पुष्प मालाओं से सजा हुआ था। उसमें और कोई नहीं जा सकता था और वह सेतिय की तरह दिखाई देता था। (समंतपासादिका, पृष्ठ 745; चानना, पूर्वोद्धृत, 199, पाद टिप्पणी संख्या 71)

धर्मानंद कोसंबी ने इस तरह की एक रोचक कहानी का हवाला दिया है-'काशी में तेलंग स्वामी नामक एक प्रसिद्ध संन्यासी थे। वे नंगे रहते थे। काशी में उनके समान नंगे घूमने वाले दूसरे भी बहुत-से परमहंस थे। उस समय वहाँ गॉडविन नामक बड़ा लोकप्रिय कलक्टर था (जिसे काशी के लोग गोविंद साहब कहते थे)। हिन्दू लोगों के रीति-रिवाजों की जानकारी उसने सहानुभूतिपूर्वक प्राप्त कर ली और ये नंगे बाबा लंगोटी लगाकर घूमा करें इसके लिए निम्नलिखित युक्ति निकाली। रास्ते में घूमने वाला नंगा बाबा जब भी पुलिस वालों को मिलता तो वे उसे साहब के पास ले जाते। तब साहब उससे पूछता, "क्या तुम परमहंस हो?" जब वह "हाँ" कहता तो साहब उसे अपना अन्न खाने को कहता। भला नंगा बाबा साहब का अन्न कैसे खाता? तब गोविंद साहब कहता, "शास्त्र में कहा गया है कि परमहंस तो किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं मानता और तुम्हारे मन में तो भेद-भाव मौजूद है। अतः तुम्हें नंगा नहीं घूमना चाहिए।" इस प्रकार बहुत-से नागा बाबाओं को उसने लंगोटी पहनने को बाध्य किया। एक बार ऐसा ही प्रसंग तेलंग स्वामी पर आ गया। जब यह बात फैल गई कि स्वामी जी को लेकर पुलिस वाले कलक्टर साहब के बंगले पर गये हैं तो उनके शिष्य एवं चाहने वाले बड़े-बड़े पंडित तथा अन्य प्रभावशाली व्यक्ति साहब के बंगले पर गये। साहब ने सबको बिठा लिया और तेलंग स्वामी से पूछा, "क्या आप परमहंस हैं?" स्वामी जी ने जब "हाँ" कहा तो साहब ने दूसरा प्रश्न पूछा, "क्या आप यहाँ का अन्न खाएंगे?"इस पर स्वामी जी ने पूछा, "क्या आप मेरा अन्न खाएंगे?" साहब ने जवाब दिया, "यद्यपि मैं परमहंस नहीं हूँ, फिर भी किसी का भी अन्न मैं खा लेता हूँ।" स्वामी जी ने वहीं अपने हाथ पर मलत्याग किया और हाथ आगे बढ़ाकर वे गोविंद साहब से बोले, "लीजिये, यह है मेरा अन्न। आप इसे खाकर दिखाइये!" साहब को बड़ी घृणा हुई और वह गुस्से से बोला, क्या यह आदमी के खाने योग्य अन्न है?" तब स्वामी जी ने वह विष्ठा खा डाली और हाथ झाड़-पोंछकर साफ कर लिया। यह देखकर साहब ने स्वामी को छोड़ दिया और फिर कभी उनकी बात भी नहीं पूछी।' (धर्मानंद कोसंबी, भगवान बुद्ध : जीवन और दर्शन, लोकभारती प्रकाशन, 1987, पृष्ठ 75-76)। जब धर्मानंद कोसंबी 1902 ईस्वी में काशी में थे तो वहां के पंडितों ने यह कहानी उन्हें बड़े "आदर" से सुनाई थी और उससे पहले उसी "आदर-बुद्धि" के साथ काशी-यात्रा नामक पुस्तक में यह प्रकाशित भी हुई थी। (धर्मानंद कोसंबी, पूर्वोद्धृत)

कहने की जरुरत नहीं कि भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा में शौच का संबंध स्वच्छता से कम, शुचिता अर्थात पवित्रता से ज्यादा है। संस्कृत के 'शौचम्' का अर्थ 'मलत्याग के कारण दूषित व्यक्तित्व का शुद्धिकरण' है। (वामन शिवराम आप्टे, संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश, पृष्ठ 1111) शायद इसीलिए हमारे यहां स्वच्छता का शुचिता से अलग शायद ही कभी अस्तित्व रहा हो। भारतीय ग्रामीण जनमानस में सदियों से चली आ रही बात कि 'खाना और पैखाना एक साथ नहीं रहना चाहिए', कमोबेश आज भी अमल में है। अर्थात जिस मकान में रसोईघर हो वहां शौचालय की बात सोची भी नहीं जा सकती। यह अवधारणा खुले में शौच का एक प्रमुख कारण रही है। इसीलिए कुछ सालों पहले तक गांव-देहात के लोग शहर में बसनेवाले लोगों को विधर्मी मानते रहे थे कि उनके घरों में रसोईघर और शौचालय साथ-साथ होता है। एक समय था जब ग्रामीण हिन्दू घरों में औरत को स्नान करने के उपरांत ही रसोईघर में प्रवेश की अनुमति होती थी। हाल-हाल तक यह बात कल्पना से परे थी कि कोई स्त्री रसोईघर में चप्पल पहनकर चली जाए। आज भी ग्रामीण परिवेश और मानसिकता की अधिकतर औरतें शौचालय से लौटने के बाद स्नान करना धर्म मानती हैं। कुछ औरतें 'फ्रेंच बाथ' से काम चलाती हैं तो कुछ औरतें अपनी देह पर पानी की बूंदें छिड़ककर 'पवित्र' होती रही हैं। कुछ घरों में अब भी आपको वैसी स्त्रियां मिल जाएंगी जिनके पास शौच जाने के लिए अलग वस्त्र होते हैं, ठीक जैसे अस्पतालों में मरीज से मिलने जाने के पहले वस्त्र बदलने होते हैं। यह है भारतीय समाज की परंपरा और आधुनिकता। दोनों में वस्त्र बदलने की क्रिया समान है लेकिन उसके पीछे की चेतना में फर्क है। एक में प्रेरक शक्ति शुचिता है तो दूसरे में स्वच्छता। दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि 21वीं शताब्दी में भी एक आम भारतीय की स्वच्छता की अवधारणा शुचिता से खाद-पानी लेती है।

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