लोक चेतना में गांधी


हमारे महापुरुष जितना इतिहास की किताबों में हैं, अफवाहों में उससे तनिक कम नहीं हैं। यह जानना दिलचस्प है कि 'मैला आँचल' उपन्यास ऐसी ही एक अफवाह के साथ शुरू होता है- 'यद्यपि 1942 के जन-आंदोलन के समय इस गांव में न तो फौजियों का कोई उत्पात हुआ था और न आंदोलन की लहर ही गांव तक पहुंच पाई थी, किंतु जिले भर की घटनाओं की खबर अफवाहों के रूप में यहां तक जरूर पहुंची थी।' (फणीश्वरनाथ रेणु, मैला आँचल, राजकमल प्रकाशन, पुनर्मुद्रण : 1996, पृष्ठ 9) और अफवाह थी कि 'मोगलाही टीशन पर गोरा सिपाही एक मोदी की बेटी को उठाकर ले गए। इसी को लेकर सिख और गोरे सिपाहियों में लड़ाई हो गई, गोली चल गई। ढोलबाजा में पूरे गांव को घेरकर आग लगा दी गई, एक बच्चा भी बचकर नहीं निकल सका। मुसहरू के ससुर ने अपनी आंखों से देखा था-ठीक आग में भूनी गई मछलियों की तरह लोगों की लाशें महीनों पड़ी रहीं, कौआ भी नहीं खा सकता था; मलेटरी का पहरा था। मुसहरू के ससुर का भतीजा फारबिस साहब का खानसामा है; वह झूठ बोलेगा?' (मैला आँचल, पृष्ठ 9) इन अफवाहों का अगर आप समाजशास्त्रीय अध्ययन करें, तो पता चलेगा कि इसके स्रोत निम्नवर्गीय, निम्नजातीय, निरक्षर लोग हैं। (डा. अवनिंद्र कुमार झा, 'लिटरेचर एंड रियलिटी : गाँधीयन मुवमेंट एंड मार्जिनल कम्युनिटीज इन नॉर्थ बिहार', अभिलेख बिहार, अंक-6, बिहार राज्य अभिलेखागार निदेशालय, पटना, 2015, पृष्ठ 286; हसन इमाम, 'महात्मा गांधी इन पॉपुलर परसेप्शन : डिबेटिंग गांधी इन द ट्वेंटी फर्स्ट सेन्चुरी', अभिलेख-बिहार, अंक 6, बिहार राज्य अभिलेखागार निदेशालय, पटना, 2015, पृष्ठ 186)

नेहरु ने इसका कुछ हाल बयान किया है, 'मुझे पता लगा कि मेरे पिताजी और मेरे बारे में एक बहुत प्रचलित दंतकथा यह है कि हम हर हफ्ते अपने कपड़े पैरिस की किसी लॉन्ड्री में धुलने को भेजते थे। हमने कई बार इसका खण्डन किया है, फिर भी यह बात प्रचलित है ही। इससे ज्यादा अजीब बाहियात बात की कल्पना भी मैं नहीं कर सकता।' (जवाहरलाल नेहरु, मेरी कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 295) 'इसी तरह से एक दूसरी दंतकथा, जोकि इन्कार करने पर भी प्रचलित है यह है कि मैं प्रिंस ऑफ वेल्स के साथ स्कूल में पढ़ता था। सच बात तो यह है कि न तो स्कूल में ही उनके साथ पढ़ा हूँ और न मुझे उनसे मिलने या बात करने का ही मौका हुआ है।' (जवाहरलाल नेहरु, मेरी कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 295-96) नौजवान स्त्री-पुरुषों का तो, एक प्रकार से, मैं नायक बन गया था। और उनकी निगाह में मेरे आसपास कुछ वीरता की आभा दिखाई पड़ती थी, मेरे बारे में गाने तैयार हो गये थे और ऐसी-ऐसी अनहोनी कहानियाँ गढ़ ली गई थीं, जिन्हें सुनकर हंसी आती थी। (जवाहरलाल नेहरु, मेरी कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 294)
कहने की जरूरत नहीं कि इस लोक चेतना में सबसे ज्यादा किस्से गांधी बाबा को लेकर हैं। मजेदार है कि गांधी, नेहरु की तरह इन किस्सों का कभी खण्डन नहीं करते। शाहिद अमीन ने गांधी की चमत्कारी शक्तियों से संबंधित कुछ रोचक बातों का उल्लेख करते हुए कहा है कि ये चमत्कारी शक्तियाँ ही गांधी को महात्मा बनाती हैं। (शाहिद अमीन, 'गांधी ऐज महात्मा : गोरखपुर डिस्ट्रिक्ट, ईस्टर्न यू पी, 1921-22', रंजीत गुहा (संपादक), सबाल्टर्न स्टडीज lll, राइटिंग ऑन साउथ एशियन हिस्ट्री एंड सोसायटी, ओ यू पी, दिल्ली, 1984, पृष्ठ 1-61) इसी परंपरा में हसन इमाम ने अपने आलेख को आगे बढ़ाया है। (हसन इमाम, 'फ्रॉम महात्मा टू गॉड : अंडरस्टैंडिंग गांधी इन कल्चरल परस्पेक्टिव्स ऑफ द इंडियन नेशनल मुवमेंट', प्रोसीडिंग्स ऑफ द फर्स्ट एनुअल इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन कंटेम्पोररी कल्चरल स्टडीज, ग्लोबल सायंस एंड टेक्नोलॉजी फोरम, सिंगापुर, दिसंबर 9-10, 2013, पृष्ठ 11-17) कहने की जरूरत नहीं कि इमाम साहब ने अपने काम को और आगे बढ़ाया है। (हसन इमाम, महात्मा गांधी इन पॉपुलर परसेप्शन : डिबेटिंग गांधी इन ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी, अभिलेख बिहार, अंक-6, बिहार राज्य अभिलेखागार निदेशालय, पटना, 2015, पृष्ठ 184-198) मेरी मां बताया करती थीं कि गांधी को उनकी इच्छा के विरुद्ध अंग्रेजी सरकार भी जेल में बंद नहीं रख सकती थी, कि गांधी में 'चमत्कारी' शक्ति थी और वे इस शक्ति की बदौलत जब चाहते थे जेल का फाटक खुल जाता था और वे बाहर निकल जाते थे। इसी आशय का एक हरियाणवी लोकगीत है-'एक जलेबी तेल में।/गांधी भेज्या जेल में।।/जेल का फाटक गिया टूट।/गांधी आया फोरन छूट।।' (kavitakosh.org) 'ढोडायचरितमानस' भी इस धारणा का उल्लेख करता है, "सहसा खबर आती है कि गान्ही बाबा जिरानिया आ रहे हैं 'साभा' करने। उन्हें थोड़े ही कोई जेल में भर्ती कर रख सकता है! एक ही मन्तर से वे ताला और दीवाल तोड़कर बाहर चले आते हैं।" (सतीनाथ भादुड़ी, ढोडायचरित मानस, पृष्ठ 85) 'मैला आँचल' उपन्यास में मठ के महंथ सेवादास को 'सतगुरु साहेब' सपने में दर्शन देते हैं और गांधीजी की पैरवी करते हैं। कहते हैं, 'तुम्हारे गाँव में परमारथ का कारज हो रहा है और तुमको मालूम नहीं? गाँधी तो मेरा ही भगत है। गाँधी इस गाँव में इसपिताल खोलकर परमारथ का कारज कर रहा है। तुम सारे गाँव को एक भंडारा दे दो।' (फणीश्वरनाथ रेणु, मैला आँचल, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, आठवाँ संस्करण : 1992, पृष्ठ 24)

आमजन के बीच गांधीजी की छवि करुणा के अवतार की थी। वे 'इतने बड़े संत हैं कि आँगन के कोने का सरसों का पौधा अगर झाड़ू से दब जाय, तो उनका दिल रो उठता है।' (ढोडायचरितमानस, पृष्ठ 228) 'मैला आँचल' की लक्ष्मी कोठारिन बालदेव जी को समझाती है, 'महतमा जी के पंथ को मत छोड़िए, बालदेव जी! महतमा जी अवतारी पुरुख हैं। ...जिस नैन से महतमा जी का दरसन किया है उसमें पाप को मत पैसने दीजिए। जिस कान से महतमा जी के उपदेस को सरबन किया है, उसमें माया की मीठी बोली को मत जाने दीजिए। महतमा जी सतगुरु के भगत हैं।' (मैला आँचल, पृष्ठ 207) और बालदेव जी गांधी के भक्त हैं। इतने बड़े कि उन पर 'कभी-कभी महतमा जी का भर (देवी-देवता का सवार होना) होता है। चुन्नी गोसाईं को तो रोज भोर को होता है।' (मैला आँचल, पृष्ठ 209) गांधीजी की मृत्यु पर कमली की मां कहती है, 'वे तो नर-रूप धारन कर आए थे...लीला दिखाकर चले गए।' (मैला आँचल, पृष्ठ 288) 'ढोडायचरितमानस' का बाबू लाल सबको समझा रहा है, 'गान्ही बाबा बड़ा गुणी आदमी हैं। ...गान्ही बाबा मांस-मछली, नशा-भाँग से परहेज रखते हैं। शादी-ब्याह नहीं किया है, नंगे रहते हैं।' (सतीनाथ भादुड़ी, ढोडायचरितमानस (अनुवाद : मधुकर गंगाधर), लोकभारती प्रकाशन, 1981, पृष्ठ 45) ये क्या! 'रबिया पागल की तरह चिल्लाता दौड़ा आ रहा है-कोंहड़े के ऊपर गान्ही बाबा! ...कोंहड़े के छिलके पर गान्ही बाबा की मूरत अंकित हो गई है।' (ढोडायचरितमानस, पृष्ठ 46) और अब तो 'रेबन गुनी कोंहड़े को प्रणाम करता है। फिर चिल्लाकर कह उठता है-"लोहा मान लिया, लोहा मान लिया मैंने गान्ही बाबा का।" (पृष्ठ 48) 'कलियुग के रघुनाथ हैं महात्माजी।' (ढोडायचरितमानस, पृष्ठ 227)
महात्मा गांधी जनता के बीच इतने लोकप्रिय थे कि किसी भी काम का श्रीगणेश लोग इनकी 'जयकार' से करते थे। मैला आँचल में लक्ष्मी के संबोधन के बाद जब बालदेव का भाषण 'पियारे भाइयो!' से शुरू होनेवाला हुआ तो यादव टोली के नौजवानों ने 'गंधी महतमा की जै' से जयजयकार किया। (पृष्ठ 29) पुनः जब सिंह जी और तहसीलदार साहब का मिलन हुआ तो 'गन्ही महतमा की जै' ही बोला गया। (पृष्ठ 32) बालदेव तो कई बार सपने ही में 'गन्ही महतमा की जै' बोल जाया करते थे। (मैला आँचल, पृष्ठ 36) मेरीगंज के खम्हार खुलने की घोषणा भी 'गन्ही महतमा की जै' से होती है। (मैला आँचल, पृष्ठ 75) और इस जनता को गांधी के बारे में कोई जानकारी नहीं है-'कहाँ रहते हैं महात्माजी!...पक्की जहां खत्म हुई है, उससे भी काफी दूर, मुंगेर तारापुर, अयोध्या जी से भी दूर।' (ढोडायचरितमानस, पृष्ठ 228)

लोक चेतना में गांधी के इतने रूप हैं कि जनता हिंसक-अहिंसक हर काम में उन्हें घसीट लेती है। मैला आँचल में हमला करने निकली गुअरटोली की 'यादव सेना' 'महाबीरजी की जै' के साथ 'गन्ही महतमा की जै' के भी नारे लगाती है। (मैला आँचल, पृष्ठ 20) मेरीगंज से पुरैनिया जुलूस में जा रहे लोगों को पता है कि 'जिसके हाथ में गन्ही महतमा का झंडा रहता है, उससे गाटबाबू, चिकिहरबाबू, टिकस नहीं माँगता है।' (मैला आँचल, पृष्ठ 86-87) 1921 में फैजाबाद जिले में कुछ किसानों ने एक ताल्लुकेदार का माल असबाब लूट लिया। इन गरीब किसानों से कहा गया था कि महात्मा गांधी चाहते हैं कि वे लूट लें; और उन्होंने 'महात्मा गांधी की जय!' का नारा लगाते हुए इस आदेश का पालन किया। (जवाहरलाल नेहरु, मेरी कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 97)

स्पष्ट है कि 1917 में गांधी जब चंपारण आए तो 'चमत्कारी शक्तियां' भी उनके साथ आयीं। चंपारण पहुंचने पर लोगों ने गांधी का 'नया मालिक' के रूप में स्वागत किया। राजकुमार शुक्ल ने प्रचारित किया कि वे 'ईश्वर का अवतार' हैं तथा गोरे अंग्रेजों से भारतमाता की मुक्ति के लिए भेजे गये हैं। ये किसान मानकर चल रहे थे कि किसी 'भगवान' ही को 'बड़का बड़का वकील लोग' का समर्थन प्राप्त हो सकता है जिनके पास अबतक अपना दुखड़ा रोने के लिए भी उन्हें फीस की मोटी रकम देनी पड़ रही थी। (बी बी मिश्र, सेलेक्ट डॉक्युमेंट्स ऑन महात्मा गाँधीज मुवमेंट इन चंपारण, 1917-1919, गवर्नमेंट ऑफ बिहार, पटना, 1963; विंध्याचल प्रसाद गुप्त, नील के धब्बे, बेतिया, 1986, 118; पापिया घोष, पीजेन्ट्स, प्लांटर्स एंड गांधी : चंपारण इन 1917, पीजेंट स्ट्रगल्स इन बिहार, 1831-1992, जानकी प्रकाशन, पटना, 1994, पृष्ठ 98-108।) डी जी तेंदुलकर बिहार के गांव की एक मजेदार कहानी का जिक्र करते हैं। एक बुढ़िया गांधीजी के समीप आई और बोली-'महाराज, मेरी उम्र 104 वर्ष की है और आंखों की नजर धुंधली हो चुकी है। मैंने बहुत सारे तीर्थस्थानों का भ्रमण किया है। मेरे खुद के घर में दो मंदिर स्थापित हैं। मेरे जानते राम और कृष्ण-दो ही अवतार थे। मैंने सुना है कि अब गांधी भी एक अवतार हैं। जबतक मैं उन्हें देख नहीं लेती हूं, मेरे प्राण अंटके रहेंगे।' (हसन इमाम, 'महात्मा गांधी इन पॉपुलर परसेप्शन : डिबेटिंग गांधी इन द ट्वेंटीफर्स्ट सेंचुरी', अभिलेख बिहार, अंक-6, बिहार राज्य अभिलेखागार निदेशालय, पटना, 2015, पृष्ठ 188 में उद्धृत) चंपारण पहुंचकर गांधी ने खुद स्वीकार किया कि ' शायद ईश्वर ने मुझे निमित्त बनाया।' (अरविंद मोहन, चंपारण डायरी, प्रभात खबर, पटना, 9.4.2017, पृष्ठ 17) बेतिया के आसपास के इलाकों में पेड़-पौधों से लेकर छप्पर के कोंहड़ा-कद्दू तक पर गांधी की आकृति उभरने लगी। (देखें, सतीनाथ भादुड़ी, ढोडायचरितमानस) इस सब की जड़ में लोगों का यह विश्वास था कि गांधी कोई साधारण आदमी नहीं बल्कि 'अवतारी पुरुष' हैं। गांधी को आदमी से अवतारी पुरुष बनाने में लोक चेतना की खासी भूमिका रही है- 'गांधी कहै, गांधी कहै, मन चित्त लाइको।/गंगा सरजू चाहे कूपा पर नहाइ के।/लिहले अवतार एही देशवा में आइ के।' (डॉक्टर राजेश्वरी शांडिल्य, 'भोजपुरी लोकगीतों में गांधी-दर्शन', www.hindi.mkgandhi.org) महात्मा गांधी को अवतार मानकर उनकी तुलना राम और कृष्ण से की गई है। राम के साथ वानर सेना और लक्ष्मण थे। श्रीकृष्ण के ग्वाल-बाल तथा बलराम थे। गांधी के साथ जनता है और जवाहर हैं। रावण और कंसरूपी अन्यायी राज्य को हटाने ही गांधी आए हैं-'अवतार महात्मा गांधी कै,/भारत के भार उतारै काँ,/सिरी राम मारे रावण काँ,/गांधी जी जग माँ परगट भये,/अन्यायी राज्य हटावै काँ,/अवतार महात्मा गांधी कै,/भारत कै भार उतारै काँ' (विद्याभूषण सिंह, अवधी लोकगीत विरासत, पृष्ठ 331) ब्रज के एक लोकगीत में भी गांधी को अवतार बताया गया है-'अवतार महात्मा गांधी हैं भारत को भार उतारन को/सिरीराम ने रावण मारा था, कान्हा ने कंस पछाड़ा था/अब गांधी ने अवतार लिया इन अंगरेजन के मारन को/सिरी राम के हाथ में धनुष बाण, कान्हा के हाथ सुदर्शन था/गांधी के हाथ में चरखा है, भारतवासिन के तारन को।' (विश्वामित्र उपाध्याय, लोकगीतों में क्रांतिकारी चेतना, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, 1999, पृष्ठ 26) नामक सत्याग्रह के दिनों में इस गीत के बोल में थोड़ा परिवर्तन हुआ-'वे चक्र सुदर्शन धारी थे,/तुम चरखाधारी कहलाते हो।/वे माखनचोर कहलाते थे,/तुम नमकचोर कहलाते हो।' (देवेंद्र स्वरूप, गांधीजी हिन्द स्वराज से नेहरु तक, 'अपनी बात')

भारत गांवों में बसता है-'भारतमाता ग्रामवासिनी'। और गांव की जनता ग्रामगीतों में। इन ग्रामगीतों को रवींद्रनाथ टैगोर ने 'जनता के अर्ध चेतन मन की स्वच्छंद रचना' कहा है। (मॉडर्न रिव्यु, सितंबर 1934) गांधीजी के लिए भी ये लोकगीत 'जनता की भाषा हैं, उनके साहित्य हैं।' (मो. क. गांधी, श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की पुस्तक 'गुजरात ऐण्ड इट्स लिटरेचर' (1935) की प्रस्तावना से) इसलिए 'भाषा की दरिद्रता जनता की दरिद्रता की प्रतीक है।' (वही) इससे आगे वे लोकगीत को समूची संस्कृति के पहरेदार मानते थे। (मो. क. गांधी, 28 जनवरी, 1948, देवेंद्र सत्यार्थी से बात करते हुए; देखें आमुख, 'धरती गाती है', प्रवीण प्रकाशन, दिल्ली, 1994,

1936 के फैजपुर कांग्रेस में देवेंद्र सत्यार्थी की भेंट गांधीजी से हुई। सत्यार्थी जी ने उन्हें एक पंजाबी लोकगीत सुनाया-'रब्ब मोया, देवता भज्ज गए/राज फिरंगिया दा।' अर्थात भगवान मर गया और देवता भाग गए। गांधीजी को यह गीत काफी पसंद आया था। उन्होंने कहा, 'मेरे और जवाहरलाल के सारे भाषण एक पलड़े में और अकेला यह गीत भारी है, क्योंकि इसमें जनता बोल उठी है।' (विष्णु प्रभाकर, 'लोक-साहित्य के यायावर', धरती गाती है, परिशिष्ट:तीन, पृष्ठ 209) गांधीजी लोकगीत की ताकत जानते थे। इसीलिए उन्होंने हिंदुस्तान में लोकगीत के सबसे बड़े अध्येता देवेंद्र सत्यार्थी की पुस्तक 'धरती गाती है' की भूमिका लिखनी स्वीकार की थी। गांधीजी ने लेखक से तनिक विनोद करते हुए कहा था, 'भूमिका लिखने की बात तो ऐसे ही है जैसे कोई मीठे दूध में एक मुट्ठी चीनी डालने को कहे। इससे हमेशा स्वाद बिगड़ने का डर रहता है।' (देवेंद्र सत्यार्थी, 'आमुख', धरती गाती है) स्वाद बिगड़ने का पहला कारण खुद लोकगीत की अपनी ताकत थी। दूसरे कारण के बारे में गांधीजी ने बताया है, 'गुरुदेव को भी तुम्हारा लोकगीत संबंधी कार्य प्रिय था। आज वे होते तो मैं तुमसे कहता उन्हीं के पास जाओ। पर अब यह जिम्मेदारी मुझपर आ पड़ी है। सचमुच मेरे हाथ में यह पतवार ठीक नहीं चलेगी, ठीक सजेगी भी नहीं।' (28 जनवरी 1948 को गांधी लेखक से बात करते हुए। देखें, 'आमुख' धरती गाती है) पांडुलिपि बहुत दिनों तक उनके पास पड़ी रही। 29 जनवरी 1948 के दिन संध्या-प्रार्थना के बाद जब बापू अपनी कुटिया की ओर लौट रहे थे तब सत्यार्थी जी उनके पास पहुंचे। कुछ क्षण चुपचाप साथ-साथ चलते रहे। फिर सत्यार्थी जी ने थोड़ा पास आकर उन्हें याद दिलाया कि 'अभी तक वे उनकी पुस्तक की भूमिका नहीं लिख सके हैं। और सुना है कि अब वे वर्धा जा रहे हैं।' गांधीजी ने अपनी टिपिकल शैली में उत्तर दिया, 'मुझे तो पता नहीं कौन सा गांधी वर्धा जा रहा है और जा भी रहा है तो वहां मर थोड़े ही जाएगा। यहीं लौटकर आएगा। प्यारे लाल से कह देना में लिखवा दूंगा।' (विष्णु प्रभाकर, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 214) लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अगले दिन गांधी की हत्या हो गई और उन्हें अपनी प्रिय पुस्तक की भूमिका लिखे बगैर शहीद होना पड़ा। आप कह सकते हैं कि यह गांधी की नहीं, अपितु भारत की लोक चेतना की शहादत थी।

भारतीय राजनीति में गांधी का आगमन क्षितिज पर पौ फटने जैसा था। आशा की नई किरण से नहाया यह पंजाबी लोकगीत कहता है-'हमारे आँगन में सूर्य उदय हुआ है, सूर्य उदय हुआ है।/सूर्य देखने के लिए आओ, हे गांधी, आओ हे गांधी!/तुम भी तो एक सूर्य हो, एक सूर्य हो।/सूर्य देखने के लिए आओ, हे गांधी, आओ, हे गांधी!' (साडे बेहड़े सूरज चढ़िया, सूरज चढ़िया/सूरज वेखण आओ गांधी, आओ गांधी/तूं वी ते इक्क सूरज एँ, इक्क सूरज एँ/सूरज वेखण आओ गांधी, आओ गांधी।' (बेला फूले आधी रात, पृष्ठ 360-361) इस गीत में गांधी की सूर्य से तुलना करने की शैली काफी प्रभावोत्पादक है। एक विद्वान का तो कहना है कि 'इस गीत की उठान तो एकदम वैदिक ऋचाओं का स्मरण करा रही है।' जॉर्जिया प्रान्त के 'दो सूर्य' शीर्षक एक रूसी गीत में लेनिन के लिए भी सूर्य की उपमा दी गई है-'सूर्य, आओ, प्रकट हो,/हम बहुत आँसू बहा चुके/दुख को हल्का करो/लेनिन तुम्हारे ही समान था/अपनी ज्योति उसे भेंट करो/मैं बताये देता हूँ/तुम लेनिन की बराबरी नहीं कर सकते/दिन का अवसान होते ही तुम्हारी आभा क्षीण हो जाती है/पर लेनिन के प्रकाश का लोप नहीं होता।' (बेला फूले आधी रात, पृष्ठ 363)

लोकगीत आजादी की लड़ाई से विरक्त नहीं रहा है, और आजादी की इस लड़ाई के हीरो गांधी हैं। गांधी अंग्रेजी शिक्षा लेकर आए थे लेकिन उनकी भारतीयता जनता की नजरों में असंदिग्ध थी। संथाल लोकगीत में गांधी मुक्तिदाता के रूप में याद किये जाते हैं-'है माँ, पश्चिम दिशा से गांधी बाबा आये हैं।/उनके हाथ में कानून की पोथी है।/उनके माथे पर खद्दर की टोपी है।/उनके कंधे पर मोटा गमछा है।/हे बंधुगण, सुनो।/वे हम लोगों को बचाने के लिए आये हैं।' ('चेतान दिसम् खुन गांधी बाबाये दराए कान/तीरे तापे नायोगो कानुन पुथी/बहक् रेताए खद्दर टोपरी/तारिन रेताए नाया गो मोटा गमछा/माहो दिसम् रेन मानवाँ वंचाव/तबोन लगतिए है अकाना।', बेला फूले आधी रात, पृष्ठ 355) अंग्रेजी साम्राज्यवाद से भारतीय जन की मुक्ति गांधी से ही संभव थी। जनता ने उनके नेतृत्व में अटूट विश्वास व्यक्त किया-'इस बड़ी धरती के ऊपर,/अंग्रेजों ने गहरे गर्त्त की जो सृष्टि रच रखी है,/उसमें हम गिर गये हैं।/हे (गांधी) बाबा, आप इस गहरे गर्त से हमारा उद्धार कीजिए।' (नुमिन मारांग धरती रे गाडा/इंगराज को बेनाब आकात्/गाडा रे दो बाबाञ ञराकना/ गाडा खोन दो बाबा राकाप कङ में/मनिवा होड़ बाबाञ बाञचाब कोआ।', बेला फूले आधी रात, पृष्ठ 355)

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नारी एक गीत में अपने प्रियतम से कहती है-'मैं भी तेरे साथ चलूंगी, गांधी के जलसे में/यू खरा रुपइया चाँदी का/यू राज महात्मा गांधी का/खद्दर की पहनी तेहल, सुनहले गहने!' (विष्णु प्रभाकर, 'लोक- साहित्य के यायावर', धरती गाती है, परिशिष्ट:तीन, पृष्ठ 209) एक अवधी बिरहा में लोक-कवि ने यह साबित करने का यत्न किया है कि गाँधीजी ने जीन जैसा मोटा कपड़ा अथवा खद्दर पहनने की बुद्धि अँग्रेजों ही से सीखी थी-'अक्किल अँग्रेजन से लीन/कपड़ा पहरो मोटिया जीन/नहीं तो हो जै हो बेदीन।' (बेला फूले आधी रात, पृष्ठ 359) कांग्रेस में चरखा की ट्रेनिंग देनेवाली औरतें गाती हैं, 'चरखा हमार भतार-पूत, चरखा हमार नाती; चरखा के बदौलत मोरा दुआर झूले हाथी।' (मैला आँचल, पृष्ठ 118) आजादी की लड़ाई के दिनों में बापू के नाम पर यह गीत भी मशहूर था, 'जो पहने सो काते,/जो काते सो पहने।' (मैला आँचल, पृष्ठ 118) गांवों में होली के अवसर पर 'बटगमनी' फगुआ (रास्ते में गाया जानेवाला) के बोल कुछ इस तरह के होते थे-'आई रे होरिया आई फिर से!/आई रे/गावत गाँधी राग मनोहर/चरखा चलाबे बाबू राजेंदर/गूँजल भारत अमहाई रे! होरिया आई फिर से!/वीर जमाहिर शान हमारो,/बल्लभ है अभिमान हमारो,/जयप्रकाश जैसो भाई रे!/होरिया आई फिर से!' (मैला आँचल, पृष्ठ 126) सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं के द्वारा होली के अवसर पर कांग्रेस, खद्दर और सुराज से संबंधित जोगीरा तनिक व्यंग्य के साथ गाया जाता था-'बरसा में गड्ढे जब जाते हैं भर/बेंग हजारों उसमें करते हैं टर्र/वैसे ही राज आज कांग्रेस का है/लीडर बने हैं सभी कल के गीदड़ ...जोगी जी सर...र र...!/जोगी जी, ताल न टूटे/जोगी जी, तीन-ताल पर ढोलक बाजे/जोगी जी, ताक धिना धिन!/चर्खा कातो, खद्धड़ पहनो, रहे हाथ में झोली/दिन दहाड़े करो डकैती बोल सुराजी बोली.../जोगी जी सर ...र र....।' (मैला आँचल, पृष्ठ 125)

गांधी का प्रभाव युवकों पर कितना पड़ा था, यह सर्वविदित है। लोकगीतों का 'दुलहा' भी तिरंगा हाथ में लिए चल रहा है-'बन्ना हमारो गांधी के बस माँ, तिरंगा हाथ में उठा रहा है।' कुलवधू का स्वप्न है कि मेरा प्रिय गांधी के रामराज्य-स्वप्न को पूरा करेगा। भोजन, वस्त्र का उपभोग मिल-बांटकर करेगा-'गांधी तेरो सुराज सपनवाँ हरि मोरा पूरा करिहैं ना।' लोक में गांधी के सुराज का कोई एक रूप नहीं था। अगर झारखंड के आदिवासियों की बात करें तो, आजादी का संघर्ष उनकी स्मृति में परंपरा अनुरूप मानकी-पाहन व्यवस्था की पुनःस्थापना के लिए था। गांधी इसी को लाने जयपाल सिंह के साथ गांधीजी जर्मनी गए थे। किंतु नाथूराम नहीं चाहता था कि पुनः मानकी-पाहन राज हो, इसलिए उसने गांधी को गोली मार दी। (रणेन्द्र/अजय कुमार तिर्की, 'झारखंडी संस्कृति : लोक का आलोक', झारखंड एन्साइक्लोपीडिया, खंड-4, वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण : 2008, पृष्ठ 159-60) जनता इस सुराज का मतलब गांधी-राज भी समझती थी। एक गोंड गीत में-'बादल गरजता है।/मालगुजार गरजता है।/फिरंगी के राज का सिपाही भी गरजता है, हे राम!/हो हो हो...गांधी का राज होनेवाला है।' (अद्दल गरजे बद्दल गरजे/गरजे माल गुजारा हो/फिरंगी राज के हो गरजे सिपाइरा रामा/गांधी क राज होनेवाला हाय रे।', बेला फूले आधी रात, पृष्ठ 356) सुराज के जन्म पर जगह-जगह सोहर भी गाया गया-'जनमा सुराज सपूत त आज सुभ घरिया माँ।/सखिया! जगर मगर भै बिहान, त दुनिया अनन्द भै।/आजु सुफल भई कोखिया, त भारतमाता मगन भई,/घर-घर बाजी बधइया उठन लागे सोहर।/लहर लहर लहराइ, त फहरै तिरंगवा,/गांधी जी पूरिन चौक त मुँ से असीसैं।/आजु जवाहिर लाल, कलस भई थापिन,/सुभ घरी मिला बा सुराज इ जुग जुग जीयै।/बाढ़ै बँसवा कि नाईं त दुबि असि फइलई,/सखिया! देसवा बनै खुसहाल त सब सुख पावइँ।' (विद्याभूषण सिंह, अवध लोकगीत विरासत, पृष्ठ 333) 'मैला आँचल' का बालदेव सुराजी कीर्तन गाता है। लहसन का बेटा सुनरा भी बालदेव का सिखाया कीर्तन 'धन-धन गांधी जी महराज, ऐसा चरखा चलानेवाले' खूब डूबकर गाता है। (मैला आँचल, पृष्ठ 25) चंपारण सत्याग्रह के समय यह गीत भी खासा लोकप्रिय रहा-"चरखा का टूटे न तार,/चरखा चालू रहे।/गांधी बाबा चलले दुल्हा बनके,/दुलहीन बने सरकार चरखा चालू रहे।" (रमेश चंद्र झा, स्वाधीनता समर में सुगौली, पृष्ठ 21; बिनोद कुमार वर्मा, जानकी प्रकाशन, पटना, 1992, पृष्ठ 43।) सुराज और चरखा का संबंध अटूट है-'जब तक फल सुराज नहीं पावें, गाँधी जी चरखा चलावें, मोहन हो? गाँधी जी चरखा चलावें।' (मैला आँचल, पृष्ठ 218) आजादी के बाद का सुराजी कीर्तन देखें, 'कथि जे चढ़िये आयेल/भारथ माता/कथि जे चढ़ल सुराज/चलु सखी देखन को!/कथि जे चढ़िये आयेल/बीर जमाहिर/कथि पर गंधी महराज। चलु सखी.../हाथी चढ़ल आवे भारथमाता/डोली में बैठल सुराज! चलु सखी देखन को/घोड़ा चढ़िये आये बीर जमाहिर/पैदल गंधी महराज। चलु सखी देखन को।' (मैला आँचल, पृष्ठ 224)

गांधी की जय-जयकार लोकगीतों में गूंज उठी थी-'एक छोटी चवन्नी चाँदी की, जय बोल महात्मा गांधी की।' (विद्याभूषण सिंह, अवधी लोकगीत विरासत, पृष्ठ 330) बिहार में बाईजी (नाचवालियाँ) के गीत भी महात्मा गांधी, खादी और चर्खा से अप्रभावित नहीं रह सके-'खादी के चुनरिया रँग दे छापेदार रे रँगरेजवा/बहुत दिनन से लागल बा मन हमार रे रँगरेजवा!/...कहीं पे छापो गंधी महतमा/चर्खा मस्त चलाते हैं,/कहीं पे छापो वीर जमाहिर/जेल के भीतर जाते हैं।/अँचरा पे छापो झंडा तेरंगा/बाँका लहरदार रे रँगरेजवा!' (मैला आँचल, पृष्ठ 228) कभी-कभी जनता की पस्ती और गांधी की अशक्तता भी इन गीतों में व्यक्त होती-'का करें गांधी जी अकेले, तिलक परलोक बसे,/कवन सरोजनी के आस अबहिं परदेस रही।' (मैला आँचल, पृष्ठ 129)
आजादी के बाद गांधी की छवि बदलती है। आप देखें :
'ब्योधा जाल पसारा रे हिरणा, ब्योधा जाल पसारा।
झूठ सुराज के फंद रचावल, लंबी-लंबी बतिया के चारा।
मुंह में गाँधीजी के नाम विराजे, बगल में रखलवा दुधारा।
रे हिरणा, ब्योधा जाल पसारा।
अरे मोटिया धोती, टोपी पहिन के फिरतवा रँगल सियारा।
जनता के लोहू पीके डकारे, ऐसन सुराज हमारा।।
रे हिरणा, ब्योधा जाल पसारा।
महँगी में रोवे जनता, किसनवाँ, मौज करे जमींदारा।
गांधीजी को बेचत चोर बजार में, लीडर, सेठ, साहुकारा।
रे हिरणा, ब्योधा जाल पसारा।' (रेणु रचनावली, भाग 4, पृष्ठ 39; डॉ. रामदेव प्रसाद, 'रेणु की रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना', परिषद-पत्रिका (बिहार राष्ट्रभाषा परिषद), वर्ष 47, अंक 1-4, पृष्ठ 81)

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