भाषा पर असंबद्ध फेसबुकी टिप्पणियाँ


1. फेसबुक-विवाद के बहाने
इन दिनों फेसबुक पर शब्द और शब्दार्थ को लेकर काफी बहस चल रही है। लोग शब्दों के सामान्य प्रयोग की स्थिति में भी उनके विशिष्ट अथवा लाक्षणिक अर्थ ग्रहण कर रहे हैं। मैं कोई भाषा-मर्मज्ञ तो नहीं हूँ कि फतवे जारी कर सकूँ और न ही चेले-चपाटी हैं कि वे मेरे फरमान को लेकर उड़ चलें। किंतु भाषा के अप्रतिम जानकारों की ही तरह मेरे जीवन में भी भाषा का दखल रहा है। इस सरोकार के आधार पर ही मैं भाषा (शब्द और शब्दार्थ) के बारे में कुछ मोटी बातें कह सकने की स्थिति में हूँ।

भाषाविज्ञान की मोटी बात है कि अर्थ शब्द के नहीं, पद के होते हैं। शब्द वाक्य में प्रयुक्त होकर पद बनते हैं। अर्थात वाक्य में प्रयुक्त होने की स्थिति में ही शब्द अर्थ ग्रहण कर अपने को अभिव्यक्त करते हैं। सम्प्रेषण की इस पूरी प्रक्रिया में वक्ता और श्रोता दोनों ही की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। वक्ता और श्रोता की नीयत ही शब्दार्थ तय करती है। एक ही साथ भाषा दो काम करती है। अर्थात भाषा अगर कुछ व्यक्त करती है तो ठीक उसी समय कुछ अव्यक्त भी छोड़ जाती है। कहने की जरूरत नहीं कि व्यक्त और अव्यक्त दोनों ही सोद्देश्य हैं।

हम अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक स्थिति के हिसाब से शब्द का अर्थ ग्रहण करते हैं। याद है कि जब मैं 9वीं कक्षा में था तो मेरे एक ग्रामीण ने मुझे 'हिन्दू' कहकर गाली देने की कोशिश की थी। कौन नहीं जानता कि मौलवी एक सम्मानसूचक शब्द है। किंतु हिन्दू परिवारों में मौलवी शब्द का प्रयोग उपहास के अर्थ भी प्रयुक्त होता है। जब किसी का मजाक उड़ाना हो अथवा अपमानित करना हो तो हम सहज ही कह बैठते हैं कि 'ज्यादा मौलवी मत बनिए'। मेरा ग्रामीण पढ़ा-लिखा नागरिक था और संभव है कि अगल-बगल कोई मुसलमान रहा हो जो अब मुझे याद नहीं। वह अगर मुझे मौलवी कहता तो निस्संदेह अपने सेकुलर चरित्र को बट्टा लगाता। मैं हिन्दू था और वह खुद भी हिन्दू था, इसलिए मेरे लिए हिन्दू शब्द का प्रयोग सेकुलर राजनीति के लिहाज से सेफ था। मैं हिन्दू था, बावजूद इसके, उसके द्वारा हिन्दू कहा जाना मुझे खला था। लगा जैसे किसी ने गाली दी हो। आज मैं कहीं अधिक सचेत रूप से इसे गाली मानता हूं। मौलवी की जगह आप पंडित या कवि जैसे शब्द को भी रख सकते हैं। मेरे बड़े भाई साहब को मौलिक रचनाकारों अर्थात कवि-कहानीकारों से थोड़ी दूरी थी। दूरी इस धारणा की वजह से थी कि इनका काम कम पढ़कर या बगैर पढ़े भी चल जाता है। इसलिए मैं जब शहर की कवि-गोष्ठियों से लौटकर आता तो वे तंज कसते। कहते, 'कवि जी आ गये कविता करके' और मेरे पास झेंपने के अलावा कोई चारा न होता।

इण्टर के जमाने अर्थात 84-85 की बात है। मैं पटना-गया लाइन की रेलगाड़ी में सफर कर रहा था। एक भलेमानुस को सीट की दरकार थी। उन्होंने आग्रह किया, 'जनाब, थोड़ी जगह देंगे क्या?' इतना सुनना था कि उसका पारा सातवें आसमान पर। बोला, 'क्या मैं मुसलमान हूँ कि जनाब कहोगे?' मारपीट तक की नौबत आ गई। किसी तरह समझा-बुझाकर मामला शांत कराया गया। 85 की बात है। मैं पटना ट्रेनिंग कॉलेज के हॉस्टल में रहा करता था। एक शाम मैं अपने एक मुसलमान मित्र के साथ हॉस्टल लौट रहा था। कमरे का अंदरूनी हिस्सा दूर ही से नजर आता था। अंदर एक महिला बैठी थी। मित्र ने पूछा-'कौन छोकरी बैठी है?' मैं इस शब्द का आदती नहीं था। जाहिर है, मेरे कान लाल हो उठे।

2. विदेशी विद्वान और संस्कृत
आज हम जिस संस्कृत भाषा और साहित्य की प्राचीनता पर गर्व करते हैं, उसकी खोज विदेशियों ने ही की- चाहे वे इंग्लैण्ड के हों या जर्मनी के। दि सैक्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट श्रृंखला की किताबों को सम्पादित करने का काम जर्मनी के मैक्स मूलर ही ने तो किया। विदेशी के नाम पर अगर हम उनका चश्मा पहनने से इनकार कर दें तो अंधता के अभिशाप से हमें कौन बचा सकता है? तुलनात्मक भाषाशास्त्र (कंपैरेटिव फिलोलॉजी) पर काम करते हुए विदेशी विद्वानों ने ही साबित किया कि संस्कृत दुनिया की प्राचीनतम भाषाओँ में से एक है। विदेशी के नाम पर अगर उनके इस योगदान को स्वीकार करने से बचें तो हमारे पास गर्व करने लायक बचेगा क्या? संस्कृत भाषा और साहित्य की दुनिया में काम करनेवाले कोलब्रुक, ग्रिफिथ, मार्शल, स्मिथ, डिलन, मैक्स मूलर, मौरिस विन्तर्निज तथा आर पिशेल जैसे सैंकड़ों यूरोपीय विद्वानों को अगर भिन्न भौगोलिक सीमा के नाम पर छोड़ दें, स्वदेशी विद्वान हम लाएंगे कहाँ से? कोई हो तब तो? कुछ भारतीय विद्वान हुए भी हैं, तो वे इन्ही विदेशी विद्वानों के काम को आगे बढ़ाते रहे हैं। ये भारतीय विद्वान अपने पूर्ववर्ती विदेशी विद्वान के काम के आगे सिर झुकाकर ही आगे बढ़ते हैं। लेकिन जिन्हें संस्कृत और संस्कृति के नाम पर केवल वोट की राजनीति करनी है उन्हें इन विद्वानों के सम्मुख नतशिर होने की क्या जरुरत?

संस्कृत ही क्यों प्राकृत भाषा और साहित्य पर किसने काम किया? आर पिशेल ने जो प्राकृत भाषाओँ का व्याकरण लिखा, उसकी तुलना में किस भारतीय भाषा वैज्ञानिक का नाम हम ले सकते हैं?
संकट है कि अभी तक बाजार में विदेशी चश्मा ही उपलब्ध है। अगर विदेशी न पहनने की अविवेकी जिद हम पाले बैठे हों तो हमें अँधा होने से कोई नहीं बचा सकता। एक सप्ताह पूर्व मैं आंख के डॉक्टर सुभाष प्रसाद के यहाँ गया था। डॉक्टर ने मोतियाबिंद के मरीज से पूछा, 'कौन सा लेंस लगा दूँ-देशी या विदेशी?' मरीज का जवाब था, 'विदेशी, डॉक्टर साहब। मुझे अपनी आंखों की ज्यादा चिंता है।'

 3. परंपरा नहीं परंपराएं कहिए
इतिहास और साहित्य के विद्यार्थी इस बात से वाकिफ हैं कि किसी ने परंपरा का मूल्यांकन किया तो किसी ने दूसरी ही परंपरा की खोज कर डाली। और हम विवाद में उलझे-फंसे रहे कि यह परंपरा कि वह परंपरा। इन बहसों से जो बात छनकर आ रही थी कि अतीत में कोई एक परंपरा नहीं होती बल्कि परंपराएं होती हैं, उसको हमलोगों ने यथोचित ग्रहण नहीं किया। यह हमारी सांस्कृतिक अनुदारता है। फ़िराक गोरखपुरी अक्सर कहा करते थे कि पाणिनि के समय में संस्कृत के नब्बे तरह के रूप लोक में प्रचलित थे। इसीलिए, आपको जानकर बात थोड़ी अटपटी लग सकती है कि फ़िराक इस संस्कृत को 'संस्कृत' न कह 'संस्कृतियां' कहते थे। पाणिनि ने इन नब्बे रूपों के बीच से संस्कृत का एक मानक रूप गढ़ा और कहा कि यही संस्कृत है। उनके चेलों समेत कई और परवर्ती विद्वानों ने मान लिया कि जो पाणिनि कहे वही मान्य है। इस तरह से पाणिनि के नाम पर संस्कृत भाषा के साथ ज्यादती हुई उससे हम सभी परिचित हैं। इसके दुष्परिणामों से और भी ज्यादा परिचित हैं। एक समय पाणिनीय होना प्रमाण माना जाता था और अपाणिनीय गलत का पर्याय। मेरी जानकारी में पाणिनि के नाम का जो आतंक है उसका जोड़ दुनिया के शायद ही किसी भाषा और साहित्य में हो।

आज जरुरत इस बात की है कि हम सांस्कृतिक उदारता का परिचय देते हुए संस्कृति की जगह संस्कृतियां और परंपरा की जगह परंपराएं मानकर बहस करें और भिन्न परंपरा और संस्कृति के लिए स्पेस छोड़ते हुए जो समय की मांग है उस अनुरूप उससे ग्रहण करें। इस कार्य में परंपरा, संस्कृति और इतिहास का विवेक हमारी मदद करेगा।

4. वर्चस्व की भाषा/भाषा में वर्चस्व
शब्द महज अभिव्यक्ति के माध्यम नहीं हैं। वे अपने में इतिहास छिपाये रहते हैं। एक भाषविद के लिए वे पुरातत्व के समान हैं। इनकी खुदाई से हम हजारों वर्षों का इतिहास किसी क्रमभंग के बगैर जान सकते हैं। आइए देखें कि संस्कृत के ये शब्द क्या हाल बयान करते हैं।
संस्कृत 'अबल' का अर्थ दुर्बल, बलहीन तथा अरक्षित है। इसी से बना अबला (नास्ति बलम् यस्या) शब्द है जो स्त्री, औरत को 'अपेक्षाकृत बलहीन होने के कारण' कहा गया। 'नूनं हि ते कविवरा विपरीतबोधा ये नित्यमाहुर-बला इति कामिनीनाम्, याभिर्विलोलतरतारक-दृष्टिपातै: शक्रादयो$पि विजितास्त्वबला: कथंता: (भर्तृहरिशतकत्रयम्, 1/11; आप्टे, संस्कृत हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 81) स्त्री को असूर्यम्पश्या भी कहा गया। असूर्यम्पश्य का मतलब है सूर्य को भी न देखनेवाला (सूर्यमपि न पश्यति)। (आप्टे, पृष्ठ 151) प्राचीन काल की अंतःपुर की नारियों के बारे में कहा जाता है कि उन्हें सूर्य देखना भी दुर्लभ था 'असूर्यमपश्या राजद्वारा:'। (वही, पृष्ठ 151 में उद्धृत) असूर्यम्पश्या का अर्थ हुआ पतिव्रता स्त्री अर्थात सती। सूर्य देखने मात्र से स्त्री का सतीत्व नष्ट हो सकता था। संभव है, सूर्य और कुंती की कहानी का असर हो।

संभवतः ऐसा माना जाता था कि कुल की मर्यादा का भार स्त्रियों के ऊपर है, इसलिए स्त्रियों के लिए बने कई शब्द कुल से निर्मित हैं। 'आदरणीय तथा उच्च वंश की स्त्री' 'कुल अँगना' कहलाती है, और उच्च कुल में उत्पन्न लड़की 'कुलकन्या'। उच्चकुलोद्भव सती साध्वी स्त्री कुलनारी है जबकि कुलटा और व्यभिचारिणी स्त्री जो अपने कुल को कलंक लगावे, कुलपांसुका है। उच्चकुलोद्भूत सती स्त्री कुलपालि:, कुलपालिका तथा कुलपाली है। सती साध्वी पत्नी कुलभार्या और अच्छे कुल की सदाचारिणी स्त्री कुलयोषित्, कुलवधू। उच्च कुल की स्त्री कुलस्त्री तथा व्यभिचारिणी स्त्री कुलटा। (आप्टे, वही, पृष्ठ 331-332)

 संस्कृत साहित्य में ग्राम्य को अश्लील कहा गया है। अश्लील अर्थ की अभिव्यक्ति करनेवाले कई शब्द इसी ग्राम्य से बने हैं। स्त्रीसंभोग अथवा मैथुन को 'ग्राम्यधर्म' कहा गया है, और वेश्या तथा रंडी को 'ग्राम्यवल्लभा'। (आप्टे, वही, पृष्ठ 399)
 
 आश्चर्य की बात है कि स्त्री की दुरवस्था के बावजूद माता का स्थान सम्मान का है। मां को अम्बा भी कहा जाता है। अम्बा का अर्थ है भद्र महिला या भद्र माता। स्नेह अथवा आदरपूर्ण संबोधन में भी इसका प्रयोग होता है। वैदिक संबोधन अंबे है, बाद की संस्कृत में अम्ब। 'किमम्बाभि: प्रेषित:, अम्बानां कार्यं निर्वर्तय' (शकुंतला, 2) कृतांजलिस्तत्र यदम्ब सत्यात् (रघुवंश, 14/16; आप्टे, पृष्ठ 101) स्त्री की इस दुरवस्था के कई कारण हैं। एक कारण शिक्षा से उनकी दूरी भी है। स्त्री के लिए अमंत्रक शब्द का प्रयोग देखने को मिलता है, जिसका अर्थ है, 'जो वेदपाठ से अनभिज्ञ हो' या 'जिसे वेद पढ़ने का अधिकार न हो', जैसे शूद्र या स्त्री। (आप्टे, पृष्ठ 97)

 5. भाषा की सत्ता /सत्ता की भाषा
कहा जाता है कि भाषा के दो प्रयोजन हैं। पहला अभिव्यक्त करना और दूसरा छिपाना। लेकिन इस दूसरे प्रयोजन में किसी भी भाषा को शायद ही सफलता मिली हो। प्रसंग यह है कि पाचीन भारत में सामान्यतया एक पति-पत्नी की प्रथा थी। बहुपति प्रथा के उदाहरण हमें इतिहास से नहीं प्राप्त होते हैं। लेकिन एक से अधिक पत्नियां रखने का रिवाज रहा होगा। वैसी स्त्रियों के लिए संस्कृत में हमें कई शब्द उपलब्ध होते हैं जिनके पति ने पत्नी के रहते दूसरा विवाह कर लिया। उदाहरण के तौर पर आप नीचे लिखे शब्दों को देख सकते हैं: अधिविन्ना (स्त्रीलिंग) = पति परित्यक्ता स्त्री, वह स्त्री जिसके रहते हुए पति दूसरा विवाह कर ले। अधिवेत्तृ (पुंलिंग) = एक स्त्री के रहते हुए दूसरा विवाह करनेवाला। अधिवेद: (पुं.), अधिवेदनम् (नपुं.) = एक स्त्री के रहते अतिरिक्त स्त्री से विवाह करना। (आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 36) अध्यूढा (स्त्री.) = वह स्त्री जिसके पति ने उसके रहते हुए दूसरा विवाह कर लिया हो। (आप्टे, पृष्ठ 38) इन उदाहरणों को देखकर किसी के भी दिमाग में एक सहज और स्वाभाविक सवाल उठ सकता है कि शादी पुरुष कर रहा है तो शब्द स्त्री के लिए क्यों बन रहे हैं? कायदे से शब्द तो पुरुष के लिए बनने चाहिए थे? यहाँ भाषा का सर्जक अपना अभिप्राय प्रकट करने से संभवतः बच रहा है। भाषा की यही मर्यादा है कि पढ़नेवालों से ज्यादा समय तक अपने प्रयोजन छिपाकर नहीं रख सकती!

कहने की जरुरत नहीं कि संस्कृत भाषा पर पुरुष वर्चस्व की छाया रही है। इसे शब्द-निर्माण-प्रक्रिया के सहारे बेहतर समझा जा सकता है। संस्कृत 'स्वैर' शब्द का अर्थ है मनमाना आचरण करनेवाला, स्वच्छंद, स्वेच्छाचारी, अनियंत्रित तथा निरंकुश। 'बद्धमिव स्वैरगतिर्जनमिह सुखसंगि नमवैमि' (शकुंतला, 5/11), 'अव्याहतै: स्वैरगतै: स तस्या:' (रघुवंश, 2/5)। स्वतंत्र, असंकोच और विश्वस्त के अर्थ में, जैसाकि' स्वैरालाप' (मुद्राराक्षस, 4/83)। किंतु जैसे ही स्त्री का सन्दर्भ आता है, उसका अर्थ नकारात्मक हो उठता है। इसलिए 'स्वैरिणी' का अर्थ असती, कुलटा, व्यभिचारिणी हो जाता है (याज्ञवल्क्य स्मृति, 1/67)। इसी तरह किसी पुरुष का मन अगर उसके वश में न हो तो वह 'अनियतआत्मन' है, जबकि इसी दोष से ग्रस्त स्त्री 'अनियतपुंस्का' अर्थात व्यभिचारिणी हो जाती है। (आप्टे, संस्कृत हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 44) कई बार तो एक ही शब्द के अर्थ स्त्री और पुरुष के लिए भिन्न हो जाते हैं। जैसे, अनुदार शब्द का अर्थ है 'उपयुक्त और योग्य पत्नी वाला'। (आप्टे, पृष्ठ 48) क्या ही मजेदार है कि 'जो अपनी पत्नी के अनुकूल चलनेवाला हो' वह भी 'अनुदार' और 'जिसकी पत्नी पति के अनुकूल चलने वाली हो वह भी 'अनुदार'। (वही)

भाषा में एक से बढ़कर एक मनोरंजक चीज भरी पड़ी है। संस्कृत 'अनुधावनम्' का सामान्य अर्थ है पीछे जाना या भागना, पीछा करना, पीछे दौड़ना, अनुसरण करना आदि। इस शब्द का अन्य अर्थ 'किसी स्त्री को पाने का असफल प्रयत्न करना' भी है। (आप्टे, संस्कृत हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 48) क्या यह मान लिया जाए कि किसी ज़माने में 'पीछे भागने' की क्रिया का सम्बन्ध स्त्री जाति से जुड़ा रहा होगा?

6. मातृभाषा के बहाने
सबसे पहले मैं फेसबुक का शुक्रिया अदा करता हूँ कि उसने मातृभाषा दिवस की याद दिलायी। फिर फेसबुक पर मातृभाषा को लेकर तरह-तरह के सवाल और तमाम तरह की उलझनें। सवाल कि मातृभाषा आखिर किसे कहें? फिर तरह-तरह के उत्तर। कोई कहता माँ से सीखी भाषा तो कोई कहता जिस भाषा में माँ बात करती है। मैं अब तक मानता रहा था कि मेरी मातृभाषा मगही है। यह मेरा सौभाग्य अथवा संयोग है कि अपनी मातृभाषा को लेकर न पहले कोई भ्रम था न कल को होनेवाला है। लेकिन मेरे जैसा सौभाग्य कितने लोगों को प्राप्त है? खुद मेरे बेटे को भी नहीं। मेरी माँ का जन्म मगही के इलाके में हुआ था, शादी भी उसी इलाके में हुई। इसलिए वे अपनी मातृभाषा निर्विघ्न बोलती रहीं। और आज हम भाई-बहन निर्द्वन्द्व हो कह सकते हैं कि हमारी मातृभाषा मगही है। लेकिन इसी निर्द्वन्द्व भाव से मेरा बेटा अपनी मातृभाषा मगही बताने का 'गर्व' हासिल नहीं कर सकता। उसकी माँ भागलपुर की अंगिका भाषी रही है। उन्होंने अपनी माँ से मातृभाषा के रूप में अंगिका हासिल की थी जबकि उन्हें अपने बेटे से मगही में बात करनी पड़ी। अर्थात पति की मातृभाषा में। मातृभाषा की इस ट्रेजडी को क्या कहेंगे आप? बोली जा रही है पिता की भाषा और नाम है मातृभाषा!

आज जब मैं मातृभाषा पर सोचने लगा तो मुझे नामवर सिंह याद आये। साल 87 के आसपास का समय होगा जब वे प्रगतिशील लेखक संघ पटना की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में बोलने आये थे। विषय जयशंकर प्रसाद से सम्बंधित कुछ था। उक्त गोष्ठी में नामवर सिंह ने एक अत्यंत मार्मिक बात कही थी। प्रसंग वर्ण और जाति की शुद्धता का था। नामवर जी ने कहा कि इतिहासकार और समाजशास्त्री वर्ण और जाति की जितनी बात कर लें, चाहे जितनी थीसिस लिख डालें, सच्चाई केवल हमारी माताएं जानती हैं। आज मातृभाषा के प्रसंग में मुझे नामवर सिंह की वही बात दुहराने की विवशता है कि हम मर्द लोग निज मातृभाषा को लेकर जो फतवे दे डालें, मातृभाषा की ट्रेजडी सिर्फ और सिर्फ माताएं ही बखान सकती हैं।

7. शिवबिहारी राय की हिंदी
जिन लोगों का हिंदी से ठीक ठाक परिचय नहीं होता वे शुद्ध हिंदी बोलने के चक्कर में केवल स्त्रीलिंग बोलते हैं। ऐसे ही बोलक्कड़ों को देखकर लोगों ने हिंदी को 'जनानी विषय' कहा होगा। ऐसे ही एक बोलक्कड़ बी डी पब्लिक स्कूल के मालिक/डायरेक्टर शिवबिहारी राय थे। मैं कभी वहां इतिहास पढ़ाया करता था। एक दिन मैं अपनी कक्षा में जैसे ही दाखिल हुआ कि बच्चों ने एकस्वर से पूछना शुरू किया कि सर, बताइये कि विद्यालय स्त्रीलिंग है अथवा पुल्लिंग? मैं बताने ही वाला था कि ध्यान आया कि अरे यहाँ से तो अभी राय जी निकले हैं! अतः मैंने बच्चों को बहलाने की कोशिश की। कहा, मैं हिंदी का शिक्षक नहीं हूँ। यह सवाल हिंदी शिक्षक से करना। मैंने अपने ज्ञान की सीमा बताई। लेकिन वे कहाँ मानने वाले। छात्र तो पहली ही मुलाकात में शिक्षक की स्कैनिंग कर लेते है। अंततः मुझे बताना ही पड़ा कि विद्यालय पुल्लिंग है। छात्रों ने कहा, सर, डायरेक्टर सर तो बोले कि विद्यालय सोमवार को खुलेगी।' मैंने कहा, 'डायरेक्टर ऐसा कह सकते हैं। शिक्षकों को स्त्रीलिंग बोलने की आजादी नहीं है।'

8. शुद्ध हिंदी की चिंता
प्रभात रंजन जी की टिप्पणियाँ प्रभात खबर, पटना में छपती रही हैं और मैं उन्हें पढ़ता रहा हूँ। 1 दिसंबर को उनकी टिप्पणी 'अशुद्ध हिंदी की शिक्षा' छपी है।
 
 उन्होंने शुरुआत बेटी की 'अशुद्ध हिंदी' और शिक्षक की शिकायत से की है। मेरे लिए यह ख़ुशी की बात है कि शिक्षक अब भी शिकायत की हैसियत रखते हैं।
 
 'शुद्ध हिंदी' एक व्यापक पद है। प्रभात जी की 'शुद्ध हिंदी' से लगता है, वे 'वर्तनी की शुद्धता' की बात कर रहे हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी शिक्षक हैं। उनके छात्र महानगर के और महाविद्यालय स्तर के हैं। मैं गाँव के हाई स्कूल का शिक्षक हूँ। मेरे बच्चे 'शुद्ध हिंदी' का मतलब 'संस्कृतनिष्ठ हिंदी' समझते हैं। वे अक्सर पूछते हैं, 'सर, स्टेशन, सिगरेट, प्लेटफॉर्म आदि को हिंदी में क्या कहते हैं?' मैं उन्हें बताता हूँ कि अब ये हिंदी के शब्द हैं, लेकिन वे मेरे उत्तर से असंतुष्ट रहते हैं।
 
दूसरी तरफ, कुछ लोगों को 'शुद्ध हिंदी' एक अतिरिक्त मांग लगती है। अतः वे शुद्ध हिंदी के आग्रही को 'शुद्धतावादी' कहते है। यह 'शुद्धतावाद' शीघ्र ही 'ब्राह्मणवाद' में तब्दील होकर भाषा से इतर एक नये विमर्श की शुरुआत करता है।
 
 मैं कभी हिंदी का विद्यार्थी नहीं रहा। मैं इतिहास का विद्यार्थी रहा और हिंदी मेरी पढ़ाई-लिखाई का माध्यम रही। इसलिए हिंदी-भाषा-व्याकरण की बारीकियों में कभी गया नहीं। मेरी कभी इतनी औकात भी नहीं हुई। इसका एक फायदा यह हुआ कि भाषा को मैंने बोध के स्तर पर ग्रहण किया। एक 'कुजात' की तरह, हिंदी के विद्यार्थी की तरह नहीं। मुझे लगता है कि हिंदी का विद्यार्थी व्याकरण पहले जान लेता है, भाषा उसके बाद जानना शुरू करता है। इस प्रक्रिया में भाषा उससे बिदक जाती है। वह भाषा बोध विकसित नहीं कर पाता। इस सन्दर्भ में एक घटना का उल्लेख करना चाहूँगा। 97-98 में मैं पटने के 'स्वरूप विद्या निकेतन' विद्यालय में हिंदी पढ़ाया करता था। वहाँ हिंदी व्याकरण के एक शिक्षक थे जिनका नाम सत्येंद्र कुमार पाठक था। पढ़ाने के दौरान मेरे मुंह से निकले एक वाक्य को उन्होंने आपत्तिजनक पाया। वाक्य था: 'नेहरु भारत के प्रथम प्रधानमंत्री हैं।' उनका कहना था कि यह वाक्य गलत है। 'हैं' की जगह 'थे' व्याकरणसम्मत है। उनके साथ जो मेरी बहस हुई तो लगा कि ये महाशय न व्याकरण पढ़ सके न भाषा की तमीज़ हासिल कर सके।

मैं प्रभात जी की इस बात से सहमत नहीं हूँ कि हम हिंदी की तुलना में विदेशी भाषा ज्यादा सही बोलते-लिखते है। मैंने अंग्रेजी के शिक्षकों को अक्सर ही 'एक लेडीज' बोलते सुना है। कई लोगों को टोकना पड़ा कि भाई जब एक है तो लेडी कहिए न! मुझे छात्रों की अशुद्ध हिंदी की तुलना में हिंदी लेखकों की हिंदी ज्यादा चिंतित करती है। जब 'महारथी' लिखा जाता था तो बच्चों को समझाना आसान था कि महारथी वे हैं जिनके पास एक से अधिक रथ हैं। किन्तु अब के लेखकों को 'महारती' लिखने में 'महारत' हासिल है! इसी तरह पहले 'कठघरा' समझाना आसान था कि भइया यह काठ का बना घर है। अब बताइए कि छोटे बच्चों को मैं 'कटघरा' कैसे बताऊँ? हिंदी में ऐसे कई शब्द हैं जो हमारी बेवकूफियों की वजह से पैदा हुए हैं और जिनका कोई तर्कशास्त्र नहीं है।

 हमारी भाषा अगर अशुद्ध है तो इसका कारण है कि हमलोग भाषा के प्रति सचेत नहीं हैं। प्रभात रंजन जी सचेत होते तो एक ही वाक्य में 'इसलिए' और 'क्योंकि' का प्रयोग शायद ही करते!
 
9. खराब हिंदी का मर्म
किसी शाम मैं एक पब्लिक स्कूल के मालिक के साथ बैठा था। वहाँ एक छात्र के अभिभावक पधारे। उन्होंने अपने बच्चे से संबधित एक शिकायत की, 'सर, आजकल इसकी हिंदी कमजोर हो चली है।' स्कूल डायरेक्टर ने कहा, 'महाराज, यह तो ख़ुशी की बात है। जाइए और मिठाई लेकर आइए। अभिभावक भारी मन से मिठाई खरीद लाया। डाइरेक्टर ने उपस्थित लोगों के बीच मिठाई बांटी। कहा, 'हिंदी कमजोर होने का मतलब है कि उसकी अंग्रेजी मजबूत हो रही है।' अभिभावक फूले न समा रहा था।
 
10. युद्ध या कि जुद्ध
किसी दिन एक बाप को सूझी कि वह बेटे की भाषिक क्षमता की जाँच कर ले। इस ख्याल से पिता ने श्रुतिलेख लिखाने की ठानी। बेटे का दुर्भाग्य कहिये कि पिता का उच्चारण गड़बड़ था। पिता युद्ध का उच्चारण जुद्ध करता और बेटे से आशा करता कि वह युद्ध लिखे। लगभग आध घंटे तक पुत्र-पिता की आशा पर पानी फेरता रहा। अंत में पिता ने पुत्र की जमकर पिटाई कर दी। यह कोई मजाक अथवा चुटकुला नहीं, एक सचमुच के बच्चे के साथ घटी त्रासदी है।
 
11. भाषा और समाज
एक वर्ग-विभाजित समाज में भाषाओं की भी सामाजिक हैसियत होती है। भारत में अंग्रेजी सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से श्रेष्ठ की भाषा है। भाषा हमें एक पहचान देती है। शासक वर्ग हमेशा आम जन की भाषा से भिन्न भाषा का प्रयोग करता है। यह भाषा-नीति उसे विशिष्टता और सुरक्षा प्रदान करता है। उनके बुद्धिजीवी भी उसी भाषा में बात करते हैं। बुद्धिजीवी अगर आम जन की भाषा बोलने लगें तो उनकी विशिष्टता बहुत हद तक स्वतः समाप्त मानी जायेगी। इसकी जड़ें औपनिवेशिक दासता से उत्पन्न मानसिकता में भी है। कई राजनीतिक पार्टियां भी, जो आम जन की मुक्ति की बात करती रही हैं, भाषा के सवाल पर अंग्रेजी से चिपकी हैं। कारण शायद यह हो कि उनका नेतृत्व भी उच्च मध्य वर्ग के हाथों में है। आंदोलनों और पार्टियों के नेता जब किसानों-मजदूरों के बीच जाएंगे तभी शायद यह सवाल हल हो। अकादमिक जगत में भी हमें वैसे बुद्धिजीवियों की फौज के आगमन का इंतजार है जो कह सके कि मेरे दादा हलवाहे थे। देश के स्तर पर एक तरह के स्कूल और पाठ्यक्रम की गारण्टी भी इस समस्या को हल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हो सकती है।

 सरकार ही क्यों वामपंथी पार्टियां तक सारा कम अंग्रेजी में करती हैं। यह सब सुविधा और सहूलियत के नाम पर चलाया जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि एक वर्ग-विभाजित समाज में भाषा भी अपनी सांस्कृतिक-सामाजिक हैसियत के आधार पर वर्गीकृत है। हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी एलीट है तो भोजपुरी -मगही के मुकाबले हिंदी। किसी मगही-भाषी के समक्ष आप अगर खड़ी बोली हिंदी बोलते हैं तो झट कह देगा-'जादे अँगरेजी मत झाड़$'।

सच तो यह है कि भाषाओँ में आपस में विरोध नहीं होता। हमारा यह मानना कि हिंदी के विकास से बोलियां कमजोर अथवा नष्टप्राय हो रही हैं, वैज्ञानिक या तर्कसम्मत नहीं है.किसी भी भाषा का 'स्वतंत्र विकास' किसी भी दूसरी भाषा के नैसर्गिक विकास में बाधक नहीं है। यहाँ तक कि अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी भाषाओँ से हिंदी समृद्ध हुई है। मुझे लगता है, हम भाषा पर बात करते विचार को अलग छोड़ देते हैं। अंग्रेजी ने विचार के स्तर पर हिंदी एवं अन्य भाषाओँ को जो योगदान दिया है उसे भुलाया नहीं जा सकता। सारी गडबड़ी भाषा के 'प्रायोजित विकास' की है।

12. जननी नहीं है संस्कृत
संस्कृत को हिंदी की 'जननी' कहना मुझे उचित नहीं जान पड़ता। नानी, दादी-चाहे जो कह लें आप, चलेगा। जननी वही जो सीधे तौर पर जन्म दे। हिंदी सीधे-सीधे संस्कृत की कोख से नहीं निकली है। संस्कृत से ज्यादा श्रेय तो अपभ्रंश और तत्कालीन दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं को दिया जा सकता है जो सीधे तौर पर हिंदी से जुड़ी हैं। खड़ी बोली हिंदी बोलियों का परिष्कृत रूप है। संस्कृत को जननी कह देने से दूसरी तमाम भाषाओं के योगदान को नकार देने की ध्वनि निकलती है। इससे भाषा-विकास का इतिहास भी गड्डमड्ड होगा।

13. समझौता है भाषा
भाषा में ऐसे कई प्रयोग मान्य हैं. अत्युत्तम ही को लें. उत्तम की अति है यहाँ. परंपरा में 'अति' की सर्वत्र वर्जना भी है. पन्त ने 'सत्य' शब्द का हमेशा स्त्रीलिंग में प्रयोग किया है क्योंकि उन्हें यही पसंद था. इस तर्क से कि फूलने की क्रिया पहले होती है फलने की बाद में,  निराला 'फूलना-फलना' लिखते रहे लेकिन हिंदी के लोग आज तक 'फल-फूल' रहे हैं. भाषा विज्ञान-सम्मत नहीं होती.

14. मानक हिंदी
कुछ लोग 'मानक हिंदी' की दुश्चिंता से दुबले हुए जा रहे हैं. उन्हें कौन समझाए कि पहले हम एक 'मानक समाज' तो गढ़ लें ! एक तरफ हम सामाजिक बहुलता की बात करके गर्व महसूस करें और भाषा के मामले में उस विविधता को नष्ट करने की सोचें. समाज में जब कई वर्ग, जाति और संप्रदाय के लोग होंगे तो भाषा का एक मानक रूप कैसे हो सकेगा ? भाषा को देखने का हमारा तरीका लोकतान्त्रिक होना चाहिए. वह अगर साहित्य की भाषा है तो अभिव्यक्ति का एक औजार भी. किसी की भाषा को भ्रष्ट कहकर उसकी अभिव्यक्ति के औजार को कुंद किया जाता है. एक तरह की हीन भावना पैदा की जाती है. हम भूलते हैं कि मानक भाषा हमेशा एक आदर्श है.

15. धर्म और भाषा
धर्म और धर्म-प्रचारकों ने सिर्फ उन्माद ही नहीं फैलाया, दुनिया की कई भाषाओं का 'पहला व्याकरण' लिखने का गौरव भी हासिल किया। (डैविड क्रिस्टल, लिंग्विस्टिक्स, पेंगुइन, रिप्रिंट : 1980, पृष्ठ 45) अगर प्राचीन भारत का इतिहास देखें तो आधी से अधिक आबादी, अर्थात स्त्री और शूद्र को शिक्षा से दूर रखा गया। कहा गया कि इन्हें वेदपाठ आदि करने का कोई अधिकार नहीं है, ये शब्दों को बिगाड़कर कहते हैं। भाषा के बारे में एक आम धारणा थी कि इसे जनसाधारण भ्रष्ट करते हैं जबकि अभिजन इसे बिगड़ने से बचाते हैं। (वही, पृष्ठ 53) कहने की जरूरत नहीं कि तब हम लेखनकला से परिचित नहीं थे, साहित्य केवल मौखिक परंपरा में जीवित रह सकता था। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक साहित्य/ज्ञान अपने अपरिवर्तित रूप में जाये, इसके लिए भाषा में शुद्धता, उच्चारण आदि पर एक हद तक 'अनावश्यक जोर' की आवश्यकता थी। ज्ञान की मौलिकता की रक्षा का दायित्व ब्राह्मणों के पास था। उसने लोगों में डर पैदा किया कि मंत्रों के गलत उच्चारण के कुप्रभाव से यजमान को अनिष्ट भोगना पड़ सकता है। (वही, पृष्ठ 44) इस डर का भी एक सीमा तक ही प्रभाव रहा होगा क्योंकि पाणिनि कई तरह के उच्चारण की बात करता है। उच्चारण की इतनी गड़बड़ी थी कि कई शब्दों के स्रोत, अर्थ और निर्माण/विकास प्रक्रिया उन्हें भी अज्ञात थे। इस समस्या को दूर करने के उद्देश्य से उन्होंने एक 'व्याकरण' तैयार किया। इस व्याकरण से इधर-उधर होने का मतलब 'अपाणिनिय' अर्थात गलत होना था।
आधुनिक भारत की बात करें तो मलाबार क्षेत्र में सत्रहवीं सदी के अंतिम चरण से लेकर अठारहवीं सदी के चौथे दशक तक क्रियाशील रहनेवाले जेस्विट पादरी फादर हैंक्सलेडेन ने संस्कृत का एक व्याकरण लिखा जो किसी भी यूरोपीय भाषा में संस्कृत पर लिखा गया पहला व्याकरण है। (द्विजेन्द्र नारायण झा, प्राचीन भारत : सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास की पड़ताल, ग्रंथ शिल्पी, प्रथम संस्करण : 2000, पृष्ठ 13) 1767 में सबसे पहले फादर कुर्डो ने संस्कृत और यूरोपीय भाषाओं के बीच के घनिष्ठ संबंध को पहचाना। (वही)

16. भाषा बहता नीर
ऋग्वेद (5/76/2) में संस्कृत शब्द धर्म (बरतन) के लिए प्रयुक्त हुआ है। (धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 176) वैदिक साहित्य में 'अनुलोम' एवं 'प्रतिलोम' शब्द विवाह के अर्थ में नहीं प्रयुक्त हुए हैं। बृहदारण्यकोपनिषद (2/1/15) एवं कौषीतकि ब्राह्मनोपनिषद (4/18) में ऐसा आया है कि यदि एक ब्राह्मण ब्रह्मज्ञान के लिए किसी क्षत्रिय के पास जाय तो वह 'प्रतिलोम' गति कही जायगी। संभवतः इसी अर्थ को कालांतर में विवाह के लिए भी प्रयुक्त कर दिया गया। (पी वी काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 118)

आपस्तम्बगृह्यसूत्र (5/12-13), हिरण्यकेशिगृह्यसूत्र (1/9/1), याज्ञवल्क्य (1/51), पारस्करगृह्यसूत्र (2/6-7) ने स्नान शब्द को दोनों अर्थात छात्र-जीवन के उपरांत स्नान तथा गुरु-गृह से लौटने की क्रिया के अर्थ में प्रयुक्त किया है। (धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 179) ज्ञान-जल से नहाये हुए को स्नातक कहा गया। सम्भवतः बाद में जब ज्ञान की नदी सूख चली तो पानी से नहाने को ही स्नान कहा जाने लगा। 'उपेक्षितव्या:' का मूल/पुराना अर्थ है 'समीप जाकर देखना चाहिए'। बाद में इसका अर्थ तिरस्कार हो गया। निरुक्त में यह पुराने अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। 'आंखों के अत्यंत निकट रहने से अनादर होता ही है', इस प्रकार यह अर्थ आया। (सत्यव्रत, सेमैंटिक्स इन संस्कृत, पूना ओरिएंटलिस्ट, जनवरी, 1959)

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